एक गीत सुना था, “अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं…”. दूरदर्शन के सैलाब नामक धारावहिक से था यह गीत. यह धारावाहिक कभी देखा नहीं, लेकिन गीत सुना था जगजीत सिंह की “मिराज़” में.

एमस्टर्डम की गलियों में घूमते हुए इस गीत के साथ साक्षात्कार भी हो गया. एक दुकान, जो “सूंघने में भारतीय महसूस हो रही थी”, में जाने पर आभास हुआ कि दुकानदार, जिनकी उम्र होगी कोई ४५-५० वर्ष, हिन्दी में रेडियो सुन रहे थे. इससे पहले कि मैं अपने कान सतर्क करके अपने आभास का सत्यापन करता, उन्होने हिन्दी में पूछ ही लिया “आप लोग कहां से हैं”? उन्हें इस बात की प्रसन्नता हुयी कि हम भारतीय हैं. मैंने भी जिज्ञासापूर्वक उनसे यही सवाल किया, इस आशा के साथ कि वे भारत के ही उस हिस्से का नाम बतायें जहां से वे आये हैं. लेकिन जवाब मिला – “सूरीनाम, लेकिन हम लोग भारत से ही आकर सूरीनाम में बसे हैं”. उनकी आवाज़ में एक अपनापन सा था.

कहां भारत, कहां सूरीनाम और कहां नीदरलैंड! तीनों अलग-अलग महाद्वीपों, धरती के अलग-अलग छोरों पर बसे हुये देश. उन्नीसवीं सदी में नौकरी की खातिर अपनी जमीन से अलग किये गये ये लोग बस नौकर बनकर ही रह गये! दासता और शोषण के मारे उन इंसानों के वंशज करीब १५० सालों से उनकी धरोहर संभाले हुये हैं, इतनी शुद्ध हिन्दी बोलते हैं – धन्य हैं ये लोग! मैं यह सोच ही रहा था कि भगवान कृष्ण की मूर्ति के आगे जलती हुयी धूपबत्ती पर नज़र भी गयी. मैंने पूछा, आप यहां एमस्टर्डम कब आये, तो उन्होंने बस यही कहा कि बहुत साल हो गये. बातचीत बस इतने में ही पूरी हो गयी, लेकिन कुछ अधूरा-अधूरा सा अभी भी कहीं था दिलो-दिमाग़ में.

मैंने वापस आकर इंटरनेट पर खोजबीन की तो पाया कि सूरीनाम में एक समय डच साम्राज्यवाद हुआ करता था. एक बहुत ही दु:खद सूचना यह प्राप्त हुयी कि सन् १८८३ में डच लोगों ने एमस्टर्डम में सूरीनाम से लोगों को लाकर पिंजरे में बंदकर उनकी प्रदर्शनी लगायी थी – ठीक उसी तरह जैसे कि चिड़ियाघर में जानवर! गये थे हमारी ही मिट्टी से सात समंदर पार अच्छी नौकरी लेने – पीढ़ी दर पीढ़ी अत्याचार सहे, कई बार रोटी को मोहताज हुए पर भगवान कृष्ण की मिट्टी की मूरत के सामने अगरु-धूप जलाना नहीं भूले, अपनी भाषा, अपना संगीत सब याद है इन्हें. सचमुच धन्य हैं ये.

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