एक थी मम्मी, और उसके थे दो बेटे – भोलू और गोलू. एक बार गांव में पल्स पोलियो अभियान वाले स्वयंसेवक आये और जब उन्होंने गोलू को दवा पिलायी तो वह रोने लगा और बोला कि दवा कड़वी है, खैर दवा तो गयी पेट में, अब क्या. मम्मी ने सोचा कि भोलू आंगन में सो रहा है और ऐसी कड़वी दवा पिलाने के लिये उसको उठाना उचित नहीं.

अगले दिन पड़ोस की चाची ने मम्मी को बताया कि दवा न पिलाने से पैर खराब हो जाते हैं. मम्मी रोने लगी और तुरंत जाकर भोलू को सीने से लगा लिया. अभी तो भोलू १० महीने का भी नहीं है, और अभी से अगर उसको जमीन पर अकेला छोड़ दिया तो उसके पैरों की हड्डियां कमजोर हो जायेंगी. आगे जाकर तो और भी तक़लीफ होगी, इसीलिये मम्मी जब कभी भी बाज़ार-हाट या पड़ोस में जाती, भोलू को अपनी गोद में लेती. उसे हमेशा चाची की बात याद आ जाती थी कि दवा न पिलाओ तो पैर खराब हो जाते हैं.

एक दिन गोलू की भी इच्छा हुई और बोला, मम्मी मुझे भी गोद में लो ना. मम्मी को गुस्सा आया, बोली कि तूने तो दवा पी हुई है. भोलू तो सचमुच भोला था, उसे लगा कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से देखा नहीं जाता!

समय गुज़रता गया और एक दिन मम्मी को एहसास हुआ कि चाची की बात तो सच हो गयी! भोलू ५ साल का हो गया और अभी तक उसके पैर काम नहीं करते. चाची कहती हैं कि बस एक ही बार दवा न पिलायी उसी का असर है. गोलू-भोलू के मास्टरजी कहते हैं कि सारा समय भोलू को गोद में लेकर रखा तो ताकत कहां से आती बेचारे के पैरों में? मम्मी कहती है कि चाची ने नज़र लगा दी है भोलू के पैरों को. पता नहीं सच्चाई क्या है? अरे हां, इस कहानी की मम्मी का पूरा नाम है भारतमाता!

भोलू और गोलू अब बड़े हो गये हैं. भोलू हर बुधवार पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर मम्मी के साथ हाट में सामन लेने जाता है, और अभी भी उसको ऐसा लगता है कि उसके लिये मम्मी का प्यार गोलू से नहीं देखा जाता! उसे बार-बार याद आता है कि गोलू यह जानते हुये भी कि उसका अपना भाई अपाहिज है, हमेशा स्कूल की रेस में हिस्सा लेता था.

भोलू भाई, तुमको कब एहसास होगा कि मास्टरजी सही कहते थे?